सशस्त्र बल और दिव्यांगता कानून का अंतर: एक प्रश्न जिस पर बहुत कम लोग ध्यान देते हैं

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क्या देश के नागरिकों को यह जानकारी है कि Indian Army, Indian Navy और Indian Air Force के कॉम्बैटेंट (लड़ाकू) सैन्य कर्मियों को भारत के दिव्यांगता संबंधी कानूनों की सुरक्षा से बाहर रखा गया है?

भारत ने दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों को मजबूत करने के लिए पहले Persons with Disabilities Act, 1995 लागू किया और बाद में इसे अधिक व्यापक रूप देते हुए Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 लागू किया।

लेकिन एक महत्वपूर्ण और कम चर्चित तथ्य यह है कि सशस्त्र बलों के कॉम्बैटेंट कर्मियों को इन अधिनियमों से छूट दी गई है।

यह छूट केवल कानूनी नहीं, बल्कि आर्थिक और नैतिक प्रभाव भी रखती है।

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कानूनी स्थिति: कौन संरक्षित है और कौन नहीं?

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने अधिसूचनाओं के माध्यम से सशस्त्र बलों के सभी “कॉम्बैटेंट कर्मियों” को इन अधिनियमों की परिधि से बाहर रखा है।

हालाँकि, निम्नलिखित कर्मचारी इस छूट के अंतर्गत नहीं आते:

  • सैन्य अस्पतालों में कार्यरत असैनिक कर्मचारी
  • आयुध कारखानों (Ordnance Factories) के कर्मचारी
  • AFHQ सिविल सेवा कर्मचारी
  • रक्षा लेखा एवं प्रशासनिक स्टाफ

ये सभी रक्षा बजट से वेतन प्राप्त करते हैं, फिर भी उन्हें कानून की सुरक्षा प्राप्त है।

अर्थात्:
हर असैनिक सरकारी कर्मचारी को दिव्यांगता कानून का संरक्षण प्राप्त है,
लेकिन वर्दीधारी सैनिक को नहीं।

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RPwD अधिनियम, 2016 की धारा 20: असैनिक कर्मचारियों की कानूनी ढाल

Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 की धारा 20 के अनुसार:

यदि किसी असैनिक सरकारी कर्मचारी को सेवा के दौरान दिव्यांगता हो जाती है—

  • उसे न तो सेवा से हटाया जा सकता है और न ही पदावनत किया जा सकता है
  • यदि वह मूल कार्य करने में असमर्थ हो, तो विभाग को उसके लिए सुपरन्यूमेरेरी पद (अतिरिक्त पद) बनाना होगा।
  • वह पूर्ण वेतन प्राप्त करता रहेगा।
  • उसे नियमानुसार पदोन्नति भी मिलती रहेगी।
  • यह संरक्षण सेवानिवृत्ति आयु (आमतौर पर 60 वर्ष) तक लागू रहता है।

यह किसी प्रकार की दया नहीं, बल्कि विधिक अधिकार है।

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सैनिक की वास्तविकता: “इनवैलिड आउट”

यदि किसी सैनिक को स्थायी दिव्यांगता या कोमा की स्थिति में “आगे सेवा के लिए अयोग्य” घोषित कर दिया जाता है, तो उसे Invaliding Medical Board (IMB) के माध्यम से सेवा से मुक्त कर दिया जाता है।

इसके परिणाम:

  • सेवा समाप्त
  • वेतन बंद
  • पदोन्नति समाप्त
  • सैन्य पहचान का अंत

यह निर्णय अनुशासनहीनता के कारण नहीं, बल्कि सेवा के दौरान लगी चोट या बीमारी के कारण होता है।

पेंशन और कर व्यवस्था: बदलता परिदृश्य

इतिहास में सशस्त्र बलों की दिव्यांगता पेंशन को 1922 से कर-मुक्त रखा गया था। यह सेवा-सम्बन्धी बलिदान की मान्यता का प्रतीक था।

हाल के बजटीय परिवर्तनों ने कुछ मामलों में कराधान व्यवस्था को प्रभावित किया है, जिससे पूर्व सैनिकों और सेवारत कर्मियों में चिंता बढ़ी है।

मुद्दा केवल कर का नहीं है — मुद्दा समान संरक्षण का है।

एक संरचनात्मक विरोधाभास

विचार कीजिए:

  • रक्षा अस्पताल का असैनिक कर्मचारी दिव्यांगता कानून से संरक्षित है।
  • उसी परिसर में ड्यूटी के दौरान घायल सैनिक संरक्षित नहीं है।

दोनों भारत सरकार के कर्मचारी हैं।
दोनों का वेतन भारत की समेकित निधि से आता है।
दोनों आयकर देते हैं।

फिर भी दिव्यांगता की स्थिति में केवल एक को कानूनी रोजगार सुरक्षा प्राप्त है।

सशस्त्र बलों को छूट क्यों?

नीतिगत तर्क सामान्यतः यह बताते हैं:

  • परिचालन तत्परता (Operational Readiness)
  • अनुशासन और तैनाती की आवश्यकता
  • सैन्य सेवा की विशिष्ट प्रकृति

सैनिक भूमिकाओं में पूर्ण शारीरिक दक्षता आवश्यक मानी जाती है। बड़ी संख्या में स्थायी रूप से अयोग्य कर्मियों के साथ सैन्य संरचना प्रभावी नहीं रह सकती।

यह तर्क छूट के कारण को स्पष्ट करता है,
लेकिन यह नहीं बताता कि सैनिक के लिए वैकल्पिक संरक्षण क्या है।

समानता का प्रश्न

यह बहस भावनात्मक तुलना की नहीं, बल्कि विधिक संतुलन की है।

कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न:

  1. क्या सशस्त्र बलों के लिए धारा 20 जैसी वैकल्पिक कानूनी व्यवस्था होनी चाहिए?
  2. क्या गैर-लड़ाकू भूमिकाओं में सुपरन्यूमेरेरी पद संभव हैं?
  3. क्या दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा को और मजबूत किया जा सकता है?
  4. क्या दिव्यांगता लाभों को भविष्य के कर परिवर्तनों से सुरक्षित किया जा सकता है?

ये संरचनात्मक नीति संबंधी प्रश्न हैं।

“करदाताओं के पैसे” वाला तर्क

अक्सर कहा जाता है:

“आपको तो करदाताओं के पैसे से वेतन मिलता है।”

लेकिन यह भूल जाता है कि—

  • सैनिक स्वयं करदाता हैं।
  • वेतन पर आयकर स्रोत पर ही काट लिया जाता है।
  • सेवा से मुक्त हुए सैनिक भी लागू आय पर कर देते हैं।

सैनिक और राज्य का संबंध दान और लाभ का नहीं, बल्कि नागरिक और संविधान का है।

अंतरराष्ट्रीय संदर्भ

कई लोकतांत्रिक देशों में:

  • सैन्य कर्मियों को कुछ असैनिक श्रम कानूनों से छूट दी जाती है।
  • लेकिन उनके लिए अलग से सुदृढ़ वेटरन कानून और पुनर्वास व्यवस्था बनाई जाती है।

भारत में पूर्व सैनिक कल्याण योजनाएँ हैं,
परंतु धारा 20 जैसी निरंतर रोजगार सुरक्षा उपलब्ध नहीं है।

नैतिक आयाम

सैन्य सेवा स्वभावतः जोखिमपूर्ण है।
राज्य इसे निम्न माध्यमों से स्वीकार करता है:

  • वीरता पुरस्कार
  • दिव्यांगता पेंशन
  • पूर्व सैनिक लाभ
  • चिकित्सा सुविधाएँ

फिर भी दिव्यांगता कानून से छूट एक धारणा अंतर उत्पन्न करती है।

एक असैनिक कर्मचारी के पास कानूनी ढाल है।
एक सैनिक के पास प्रशासनिक निर्णय है।

अंतर सूक्ष्म है, लेकिन गहरा है।

निष्कर्ष: जागरूकता से सुधार की ओर

कॉम्बैटेंट सैन्य कर्मियों को दिव्यांगता कानून से छूट देना कानूनी रूप से वैध है।
लेकिन वैधता ही नीति विमर्श का अंत नहीं है।

एक आधुनिक लोकतंत्र समय-समय पर अपनी व्यवस्थाओं का पुनर्मूल्यांकन करता है।

जब भारत Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 के तहत असैनिक कर्मचारियों के अधिकारों को मजबूत कर रहा है, तब यह प्रश्न स्वाभाविक है:

क्या वर्दीधारी सैनिकों के लिए भी समान स्तर की वैधानिक सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है — जो सैन्य संदर्भ के अनुरूप हो?

जागरूकता पहला कदम है।
सूचित विमर्श दूसरा।
नीतिगत विकास तीसरा।

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